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रवीन्द्र व्यास
दुनिया के देश पानी की समस्या को लेकर भले ही चिंतित हो पर बुंदेलखंड अंचल के छतरपुर जिले में देश के भविष्य और पीडियों से केसे खिलवाड़ किया जा सकता है ,इसका नमूना देखना हो तो आप अवश्य छतरपुर आइये आप यंहा पाएँगे पैसा कमाने के नायाब नुस्खे ,इंजिनरी का कमाल ,मूल लक्ष्य से भटकने का चमत्कार ,वह सब भी छात्रों की जिन्दगी की कीमत पर
सुकुंवा गाँव के सेकेंडरी स्कूल में जमीन पर बनी टंकी देख कर कोतुहल जागा ,लगा सरकार ने बच्चों के पीने के पानी की अच्छी व्यवस्था कर दी है \ पास जाने पर जो पाया तो होश उड़ गए \ यह पानी की टंकी कुछ ऊपर कुछ नीचे बनी थी ,इसमे किसी टीउब वेल से पानी नहीं भरा जाता बल्की इसमे वर्षा का जल संरक्षित किया जाता है ,ताकि स्कूल के बच्चे वर्ष भर इस पानी से अपनी प्यास बुझा सकें \ वर्षा जल को संरक्षित करने के स्कूल की छत पर से दो कोने से पाइप लगाये गए थे \ पर स्कूल की छत की पट्टी टूटी देख कर हमने छात्रों से इसके टूटने का कारण पूंछा तो ,इन लोगों ने बताया की एक तो हमारे स्कूल की ऐसी तैसी कर दी अब आप पूंछ रहे है की पट्टी क्यों टूटी \ अगर पट्टी नहीं तोडते हमारा स्कूल गिर जाता \ स्कूल की छत पर पानी भर गया था ,दीवालों में सिडन आने लगी थी \ किसने बनवाई ये टंकी इन छात्रों को नहीं पता ये कोई अकेले सुकुवां गाँव की कहानी नहीं है ,किस-किस गाँव के स्कूल की बात करे लगभग हर जगह यही हालात मिले \ चाहे वे सिमरिया ,सहस्नगर ,बछर्वानी,मोराहा,प्रतापपुरा ,धमना ,चित्रही ,अतर्रा हो या सिमरधा \ मोराहा स्कूल में तो अजब नजारा देखने को मिला ,स्कूल की छत पर फसल सूख रही थी , टंकी में जाने वाले पाइप लाइन के मुहाने पर कचडे का ढेर था \यंहा के छात्र राजेश ने बताया की टंकी से कभी पानी नहीं मिला ,और ना कभी इसका उपयोग किया \ एक बार गाँव में कालेज के लड़का लड़कियां का केम्प लगा था ,तब पास के कुंए से इस टंकी को भरा गया थासल्लैया में स्कूल के पास सार्वजानिक कुआँ है ,जिसका उपयोग गाँव के लोग वा स्कूल के बच्चे करते है \यंहा भी जल संरक्षण के लिए टंकी बन गई पर पाइप लाइन नहीं जुडी प्राचार्य सुनील कुमार इस टंकी की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते है \कीरतपुरा स्कूल भवन के बगल में टंकी तो बन गई पर मजे की बात ये है की इस भवन में स्कूल ही नहीं लगता ,भवन में छत ही नहीं है \ जिस स्कूल के लिए ये टंकी बनाई गई है वो स्कूल यंहा से एक किलोमीटर दूर लगता है \कहते है की स्कूल के जब अतरिक्त कच्छ बन जायेंगे तब उसकी छत से इस टंकी को जोड़ दिया जायेगा \ सामजिक सरोकार से जुडे इस मामले की तह तक जाने के लिए बुंदेलखंड मीडिया रिसोर्स नेटवर्क [बमरन.] ने खोज बीन की तो चोंकाने वाले तात्या उभर कर सामने आये \छतरपुर जिले का सुकुंवा कोई अकेला स्कूल नहीं था जिले के ७२ स्कूलों में इस तरह की टंकी निर्माण कर दो करोड़ ३७ लाख रुपये खर्च किये गए \ रूफ वाटर हार्वेस्टिंग ,ग्रामीण स्कूलों में जल संरक्षण योजना ,यह इस जिले में २००७-२००८ से शुरू की गई \४० स्कूलों में २.४७ लाख की लागत [प्रत्येक ] से बनाये गए इस स्ट्रक्चर में कुल ९८.८० लाख रु. व्यय हुए \ २००८-२००९ में ३२ स्कूलों में ४.३२ लाख के मान से १३८.२४ लाख रु. व्यय किये गए २००९-२०१० के लिए ४.३१ लाख के मान से २८ स्कूलों में जल संरक्षण की टंकी का निर्माण प्रस्तावित है इस पर १२१.४८ लाख रु. व्यय होंगे
यूनिसेफ ने इस योजना के लिए धन राशीमध्य प्रदेश सरकार को मुहैया कराई \ उसका मकसद था की जिले के एसे स्कूलों में जहाँ पानी के स्रोत नहीं है ,और बच्चों को पीने के पानी की समस्या है ,वहां वर्षा जल को संरक्षित किया जाये \ उद्देश्य अच्छा था ,पर सरकारी तंत्र ने इस योजना का एसा सत्यानाश किया की अब यूनिसेफ वालों को भी दुबारा सोचना पड़ेगा \वर्षा जल संरक्षण के नाम पर इस कार्य को कराने वाले लोक स्वस्थ्य एवं यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री श्रीवास्तव का कहना है की हमने तो शासन की योजना वा निर्धारित कार्य डिजायन के अनुशार कार्य कराया है \हम तो वाही करते है जो सरकार के दिशा निर्देश होते है ,यदि कुछ छुट -पुट परेशानी है तो उसे ठीक करेंगे जल संरक्षण के इस तमासे की सत्यता जानने के लिए एक सर्वे स्वयं सेवी संस्था ने कराया ६० से ज्यादा स्कूलों के प्राचार्यों ने इस संरक्षित जल को पीने के लिए उपयोगी नहीं माना उनका कहना है की गन्दी छत से आने वाला पानी कैसे पीने योग्य हो सकता है \ जल संरक्षण के लिए कार्य करने वाली संस्था ग्लोबल विलेज फौंड़ेशन के प्रमुख अजय अवस्थी ने बताया की हमने अनेक स्कूलों का सर्वे किया है जिसमे विभाग ने "एक रचना सब पर लागु के सिधान्थ के तहत काम किया है वर्षा जल संरक्षण के लिए भारत सरकार के वाटर रिसोर्स मंत्रालय का जो मेनुअल है ,उसका यहाँ पालन नहीं हुआ छत पर साफ़ सफाई नहीं ,स्लोप नहीं ,कई टंकियों में पाइप नहीं लगे ,टंकी पाइप खुले छोडे गए ,टंकियों को जमीन के ऊपर बनना चाहिए पर नीचे बना दी गई टंकियों की साफ़ सफाई की कोई व्यवस्था नहीं हैजरुरी था स्कूलों में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग के प्रति बच्चों को जागरूक करना जो नहीं किया गया \यह टंकिया वहां ज्यादा उपयोगी थी ,जहाँ भू -जल बिलकुल नीचे चला गया है \इससे कंही ज्यादा बेहतर होता वाटर हार्वेस्टिंग पर कार्य किया जाता ,इतनी राशी में जिले के एक हजार विद्यालयों में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग का काम हो सकता था जो कंही ज्यादा उपयोगी होता \योजनाकारों वा धन मुहय्या कराने वाली सरकार को शायद होने वाले कार्यों की उपयोगिता से कोई सरोकार नहीं रह गया है होता तो पानी जैसी अमूल्य निधि पर लुट का यह खेल नहीं खेला जाता ,क्योंकि इससे जुड़ा है हमारी भावी पीणी का भविष्य|
http://ravindra-vyas.blogspot.com
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