विगत कुछ वर्षों से बुन्देलखण्ड मे जलवायु परिवर्तन के लक्षण स्पष्ट दिखने लगे हैं। अंग्रेजी षासन में उन्नीसवीं षताब्दि के उत्तरार्ध मे जो वन-अधिग्रहण और साथ साथ तथाकथित वैज्ञानिक प्रबंधन जिसका हस्र वन विनाष के साथ प्रारम्भ हुआ था, 1947 के बाद स्वषासन मे उसका विकराल रूप बड़े पैमाने पर वन की कटाई , उद्योग के नाम पर पहाड़ों पर उत्खनन तथा नदियों पर बांध बनाने की होड़ के रूप मे प्रकट हुआ। यहा की प्राकृतिक सम्पदा ही यहां की बरबादी का कारण बन गई । वनों की अभूतपूर्व कटाई के बाद हीरा के उत्खनन मे विदेषी कम्पनियां , ग्रेनाइट के उत्खनन तथा क्रषिंग, बालू के निष्कासन तथा बड़े प्रोजेक्ट्स को लागू कराने वाले उत्तर भारत के बड़े पूंजीपति ठेकेदार और इस सबसे लाभांष पाने वाले बहुसंख्यक राजनेता , टेक्नोक्रेट्स तथा नौकरषाह आदि सबकी मिली भगत यहं के पर्यावरण के लिये अनियंत्रित रूप से घातक सिद्ध हुई है। परिणाम अब सामने आ रहे हैं। मौसम मे अनिष्चितता आ गई है, वर्षा अनियमित हो गई है, गर्मी तथा सर्दी के तापमान मे लगातार परिवर्तन दिखने लगा है, और अच्छी उर्वर मिट्टी के बावजूद खेती अनार्थिक हो गई है।
गांवों मे जो खेती का काम था वह भी मौसम की मार ,किसान की क्षमतायें घटने तथा
तथाकथित राजनैतिक से अधिक जाति आधारित चेतना के कारण मजदूरों को आकर्षित नही करता ।
अधिकांष कृषि मजदूर काम और जीविका उपार्जन तथा नगरों के विस्तार मे सहायक की भूमिका
मे काम की तलाष मे बाहर जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों मे घर के पुरुषों के अतिरिक्त
सारा परिवार ही पलायन करने लगा है परिणाम यह है कि गांवों मे अधिकांष घरों मे वर्ष
भर ताले लगे दिखते हैं, सक्षम किसान ट्रैक्टर खरीद रहे हैं, हरयाणा तथा पंजाब के
कम्बाइन हारवेस्टरों की यायावरी बढ़ी है तथा रबी फसल के बाद खेतों मे फसल अवषेष की
जलती होली आज आम दृष्य है। फलतः भूमि की उर्वराषक्ति तथा उसे बनाये रखने वाले
जीवांष सभी नष्ट हो रहे है। जहां पहले रसायन का प्रयोग षून्य था वहा उसकी पैठ बढ़ी
है तथा उर्वरक वितरण के समय का दृष्य हृदय विदारक हो गया है। एक मात्र स्वतंत्रजीवी
अन्नदाता किसान भिखारी बना दिया गया है । बैंक तथा साहूकारों की अमानवीय व्यवस्था
ने उसे आत्महत्या की कगार मे लाकर खड़ा कर दिया है। कृषि प्रधान भारत का किसान आरत
हो रहा है और दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजार की प्रतिष्ठा प्राप्त कर यह देष दुनिया
भर से प्रतिवर्ष लिये जाने वाले ऋण के बल पर हवा भरे गुब्बारे की तरह अपनी प्रगति
के आंकड़े और प्रतिव्यक्ति प्रतिषत आय की बढ़ोत्तरी के दावे कर रहा है। कृषि का
क्षेत्र हो अथवा षिक्षा, स्वास्थ्य या उद्योग का हर क्षेत्र मे विदेषी कम्पनियो,
भारत की कतिपय बहुआयामी कम्पनियों, तथा यहा का षिक्षित सुविधाप्राप्त वर्ग अपने
हित मे ही सारे निर्णय के लिये सरकार पर हावी हो जाते हैं। उस समय आम जनता का न तो
कोई प्रतिनिधि नज़र आता है और न ही उसकी आवाज पर कोई ध्यान देता है।
बुन्देलखण्ड हो अथवा सम्पूर्ण भारत का समाज, उसकी स्थिति का विष्लेषण निम्न दृष्य प्रस्तुत करता है:
क्षेत्र तथा समाज के मूलभूत शक्ति-बिन्दु:
विशाल वन- पर्वतीय भूमि जिसे सघन वन के रूप मे विकसित किया जाय तथा उत्खनन नियंत्रित किया जाय तो वर्षा नियमित होगी, नदियां सदानीरा बनेंगी तथा जल विद्युत का अजस्र श्रोत प्राप्त होगा । जड़ी बूटिया तथा वन से आने वाली लघु वनोपज पर्याप्त उद्योगों को जन्म दे सकती है।
उपरोक्त विष्लेषण यह प्रदर्षित करते हैं कि बुन्देलखण्ड मे आज की समस्यायें चाहे वे
किसान या कृषि मजदूर से जुड़ी हों अथवा समाज के किसी भी वर्ग से , गावो की हों
अथवा अनियंत्रित कैंसर की तरह बेतरतीब बढ़ने वाले नगरीय क्षेत्रों की सभी यहां की
मूल षक्तियों को जागृत करके ही हल की जा सकती हैं। इसके लिये आवष्यकता होगी सषक्त
आत्मानुषासन तथा सामूहिक सामाजिक कर्तव्यबोध को प्रोंत्साहित करने की । इस
प्रक्रिया मे षासन तथा समाज दोनो की सज्जन षक्तिया तथा दृढ़ राजनैतिक तथा सामाजिक
संकल्प मददगार होंगे।
कुछ व्यावहारिक सुझाव बिन्दुवार नीचे दिये है:
नदियों को पुनः प्रवाही स्थिति मे लाकर उनपर केवल बराजों के माध्यम से पानी ठहराना न कि बांध बनाकर पानी को रोकना । बांध नदी के अस्तित्व को समाप्त कर देते हैं यह समझना बहुत जरूरी है।
पिछले वर्षों के अनुभव यह बताते है कि जहां जहां भी जैविक खेती की गई थी वहां मौसम के परिवर्तन का भी कोई प्रभाव नही हुआ। पाले तथा सूखे का प्रभाव वहीं ज्यादा हुआ जहां रसायन के प्रयोग से भूमि कमजोर हो गई थी। पाले तथा सूखे के कारण ही अधिकांष किसानों ने आत्महत्यायें की थीं।
लोकतांत्रिक षासन से यह अपेक्षा रहती है कि उसकी नीतिया तथा प्रक्रियायें जनपरक हों , लोगों की पीड़ायें पहले से ही समझना सुषासन की एक निषानी है। आग लगने पर तो सभी पानी पॅंहुचाते हैं , पड़ोसी तथा षत्रु भी पर समाज मे ऐसी व्यवस्थायें पहले से ही बनें कि किसी भी आपदा मे एक सीमा तक स्थानीय स्तर पर ही राहत तथा बचाव हो सके।
वैसे कृषि अथवा जीवन के अन्य जरूरी क्षेत्रों मे ऋण लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा नही देना चाहिये, छोटी मोटी जरूरतों के लिये गांव का अपना कोष ( धन, अन्न तथा चारा) होना जरूरी है । जहां बहुत ही आवष्यक हो गांव मे किसानों , कारीगरों तथा मजदूरों को बिना व्याज के ऋण की व्यवस्था होनी चाहिये।
शासन गांवों मे आज नगरों मे प्रचलित अव्यवहारिक षिक्षा को बढ़ावा न दे बल्कि होना यह चाहिये कि सभी जगह: गांव या नगर: जीवन से जुड़ी तथा जीवनोपयोगी षिक्षा की व्यवस्था हो।
किसान, मजदूर अथवा गांव के गरीब को केवल उनके व्यक्तिगत कर्तव्यों के स्तर पर अथवा षासन के दायित्वों पर ही नही छोड़ा जा सकता। पूरे समाज का सबके प्रति वैसा ही व्यवहार होना चाहियें जैसा षरीर मे किसी भी अंग मे पीड़ा होने पर मस्तिष्क का होता है । एक स्वस्थ समाज से यह अपेक्षा होती है कि स्थानीय स्तर पर गांव के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग की पीड़ा अथवा उस पर आई आपदा सब मिलकर बाटने के लिये तैयार रहें। एक गांव पर आई आपदा मे दूसरे पड़ोसी गांव मदद करें। ऐसा ग्रामपरिवार वातावरण बने यह सभ्य समाज का आवष्यक अंग है।
By: भारतेन्दु प्रकाष