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(Article) बुन्देलखण्ड: पृथक राज्य निर्माण को बड़े कदम - मनीष चतुर्वेदी

बुन्देलखण्ड: पृथक राज्य निर्माण को बड़े कदम

सरकारों की अनदेखी के चलते भूख से मौतों का सिलसिला जारी

मनीष चतुर्वेदी

आजादी के बाद के वर्षो में बुन्देलखण्ड के लोग विकास की बाट जोहते रहे है। राजनेताओं ने भी हर बार उनके हाथों में लुभावनें प्रलोभनों का झुनझुना थमाकर अपने निहित स्वार्थो की सिद्घि की। बुन्देलखण्ड देश का एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर आम लोगों के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधायें एक सपने के समान है। बुन्देलखण्ड के अनेक क्षेत्रों में रेलगाड़ी के किस्सें परीकथा के समान है और हवाई जहाज किसी अन्य लोक की कल्पना। बड़ा अजीब लगता है यह सुनने में, लेकिन यह एक हकीकत है।

विगत कुछ वर्षो में बुन्देलखण्ड में भूख से होनें बाली मौतों में बेतहासा वृद्घि हुई है। बुन्देलखण्ड का ऐसा कोई भी जिला शेष नहीं है, जो भूख से हुई मौतों से अछूता रहा हो। बुन्देलखण्ड के महोबा, हमीरपुर, बांदा, ललितपुर और जालौन समेत कई जिलों में पिछले दो माह के दौरान दो दर्जन से अधिक मौतें गरीबी और रोटी के अभाव में हुई है। मीडिया ने जहां इन मौतों की घटनाओं को सरकारों के कानों तक पहुंचाया, वहीं राजनेताओं के कान पर पर जूं तक नहीं रेंगा है। लोकसभा चुनावों के नजदीक आते ही नेताओं ने बुन्देलखण्ड के विकास के वायदों के साथ यहां की भोली जनता के बीच घुसपैठ शुरू कर दी है, वहीं पिछले पांच सालों में नजर न आने बाले यह नेता पृथक बुन्देलखण्ड राज्य के मुद्दे पर भी सबसे बड़े हिमायती बनने की होड़ में लगे है।

बुन्देलखण्ड के लोगों का मूलत: व्यवसाय कृषि, पशुपालन एवं खनन है। पीढ़ी दर पीढ़ी अपने परम्परागत व्यवसाय को करने वाले यहां के लोगों को पिछले कई सालों मेें ओलावृष्टिï, बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से दो चार होना पड़ा है। प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हुये इन किसानों को राहत के नाम पर सरकार दो से लेकर पचास रूपये के चैक थमाकर अपनी पीठ थपथपा लेती है। यह सिलसिला थमने का नाम भी नहीं ले रहा है, लेकिन अब इन्द्रदेव भी हर साल अपना प्रकोप बुन्देलखण्ड के लोगों पर बरपा रहे है। इसके बाबजूद भी बुन्देलखण्ड में उद्योगों के अभाव के चलते यहां के लोग मजबूरी में अपने परम्परागत कार्य को करने में जुटे है। शिक्षा का अभाव विकास में सबसे बड़ी बाधा है। जो लोग किसी प्रकार शिक्षा पाने में सफल रहे वह बुन्देलखण्ड से पलायन कर गये।

आजादी के बाद से ही बुन्देलखण्ड राजनेताओं के द्वारा उपेक्षित रहा है। देश की राजनीति में बुन्देलखण्ड क्षेत्र की कोई खासी भूमिका न होना उपेक्षा का प्रमुख कारण है। राजनेताओं ने बुन्देलखण्ड के विकास का मुद्दा कभी भी राष्टï्रीय पटल पर नहीं रखा। देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के मुखियाओं ने हमेशा बुन्देलखण्ड के दौरों में जनता से विकास के बायदे किये और फिर पलट कर कभी पीछे नहीं देखा। संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह, भारतीय जनशक्ति पार्टी की अध्यक्षा उमाभारती समेत अनेकों दिग्गजों ने बुन्देलखण्ड के लोगों को सिवाय विकास के वायदों के कुछ नहीं दिया। उत्तराखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने भी एक बार अपना संसदीय क्षेत्र छोड़कर बुन्देलखण्ड के झांसी संसदीय सीट पर लोकसभा का चुनाव क्षेत्र की जनता को अनेक लुभावनों वायदों के साथ लड़ा, लेकिन चुनाव के बाद कभी बुन्देलखण्ड नहीं गये। वहीं उमाभारती और मदनलाल खुराना की जन्मभूमि बुन्देलखण्ड रही है, इसके बाबजूद इनका बुन्देलखण्ड के विकास में योगदान नगण्य रहा है। राजनेताओं ने हमेशा बुन्देलखण्ड के लोगों के हितों की अनदेखी करते हुये महज निहित स्वार्थो की पूर्ति की। इसी का परिणाम है कि बुन्देलखण्ड का विकास देश के बाकी हिस्सों की तरह त्वरित न होकर मंथर गति से हुआ है।

बुन्देलखण्ड के विकास की मांग को लेकर संसद और दोनों राज्यों की विधानसभाओं में सांसदों अथवा विधायकों ने कभी भी प्रस्ताव तक रखना उचित नहीं समझा है। इसी उपेक्षा का परिणाम है कि बुन्देलखण्ड की जनता विकास के नाम पर देश के बाकी हिस्सों से कोसों पीछे है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में भूख से हो रही मौत की घटनाओं में बेतहासा वृद्घि हो रही है। इन्हीं घटनाओं के परिणाम स्वरूप अब बुन्देलखण्ड के कई संगठन विकास की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आये है। अब बुन्देलखण्ड की जनता यह मानने पर विवश हो गई है कि पृथक राज्य निर्माण के बिना क्षेत्र का विकास सम्भव नहीं है। पृथक बुन्देलखण्ड की मांग जोर पकड़ रही है। अलग प्रान्त की मांग को लेकर बुन्देलखण्ड के प्रमुख संगठन बुन्देलखण्ड विकास सेना, बुन्देलखण्ड इंसाफ सेना, बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा आदि पिछले अनेक वर्षो से आन्दोलनरत है। यह सभी संगठन अपने आंदोलनों को धीरे-धीरे उग्र रूप में बदल रहे है। खासतौर पर बुन्देलखण्ड के विकास के लिये सर्वाधिक सक्रिय संगठन बुन्देलखण्ड विकास सेना अब एक बड़ी ताकत के रूप में सामने आ चुका है। समूचे बुन्देलखण्ड में अपनी जड़े जमा चुकी बुन्देलखण्ड विकास सेना में सैनिकों की दिनों दिन बड़ रही संख्या सरकारों के लिये कभी भी परेशानी का सबब बन सकती है। संगठन द्वारा नियमित रूप से धरने और प्रदर्शन कर सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।

पिछले कई वर्षो से पृथक बुन्देलखण्ड प्रान्त की मांग को लेकर चल रहे आन्दोलन के वावजूद भी सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड के विकास की दिशा में कोई कदम न उठाये जाने के परिणाम स्वरूप अब जनता भी पृथक प्रान्त निर्माण की मांग को लेकर अपना समर्थन इन संगठनों को देने लगी है। यदि समय रहते केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड के विकास के लिये पहल नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं है जब पृथक राज्य की मांग को लेकर यह संगठन अपार जन समर्थन के साथ उग्र रूप को धारण कर लें।

Bundelkhand Sena

फोटो : पृथक राज्य निर्माण की मांग को लेकर प्रदर्शन करते बुन्देलखण्ड विकास सेना के कार्यकर्ता

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मनीष चतुर्वेदी,
353, बसुन्धरा कालोनी,
सिविल लाइन्स, ललितपुर [उoप्रo]

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