(Report) संकटग्रस्त बुन्देलखण्ड विनाश का संकेत

संकटग्रस्त बुन्देलखण्ड विनाश का संकेत

जंगल , नदी , पर्वत , जमीन , गांव , किसान, मजदूर, जंगली और पालतू जानवर जब सभी पर संकट आये तो क्या कहा जायेगा ? आज बुन्देलखण्ड मे सब ओर विनाष की झलक दिख रही है। जंगलों का सफाया, ग्रेनाइट पत्थरों तथा हीरा की विस्तृत खदानें, बिजली की कृत्रिम आवष्यकतापूर्ति हेतु जल-विद्युत की व्यवस्था नकार कर कोयले पर आधारित प्रदूषणकारी स्थापनाओं की योजना , इन कार्यों हेतु देषी तथा विदेषी निवेष, उद्योग और विकास के नाम पर रोज बढ़ती स्टोन- कषर्स की संख्या, ऊँचाई से भी अधिक गहराई तक कटते तथा खुदते हुये पहाड़, सूखती हुई सिंध, पहूज, धसान, बेतवा, केन, और चित्रकूट की मंदाकिनी जैसी पवित्र एवं निर्मल जलवाही नदियाँ, उस पर भी नदियों के जोड़-तोड़ पर गहराती जल-राजनीति, अभयारण्यो में भी वनराजों की हत्या, भटकने और कटने के लिये बहिष्कृत अथवा बेची जाने वाली गोमातायें, बैलों को रौंदते हुये ट्रैक्टर्स, साल दर साल घटती हुई जमीन की ताकत, घटती पैदावार, लुप्त होते हुये कालजयी बीज, रूठते बादल, सपरिवार पलायन के लिये मजबूर लोग और आत्महत्याओं के बढ़ते आंकड़े कौन सी कहानी सुना रहे है ?

सतही पानी के सूखने के साथ जिस तरह जमीन के अन्दर का पानी बाहर उलीचा जा रहा हैै , परिणामतः भूगर्भ जल नीचे जा रहा है उससे नगरों तथा गावों मे पीने का पानी की किल्लत बढ़ रही है । पेड़ पौधों के साथ जो बलात्कार हो रहा है और जिस तरह के उद्योग यहा डाले जा रहे हैं वह यहा की जमीन तो नष्ट करेंगे ही , हवा में जरूरी आक्सीजन को भी नही बख्शेंगे। इन सबसे जो लाभान्वित होने वाले हैं ऐसे समाज के चन्द नेता, नौकरषाह, व्यापारी तथा टेक्नोक्रेट्स क्या भविष्य में बिना आक्सीजन जिन्दा रह पायेंगे , क्या बाहर से आयात किये भोजन, पानी तथा हवा के बल पर उनकी भावी सारी पीढ़ियां अपना जीवनयापन कर सकेंगी ?

इसी स्थान पर गाॅधी भवन में पिछले दिनों कई बार बुन्देलखण्ड तथा बाहर से आये समाजकर्मी , किसान, वैज्ञानिक, बौद्धिक तथा पर्यावरणविद् समस्या पर विचार विमर्ष के समय इतने आषंकित हुये थे कि उन्होने बुन्देलखण्ड के भविष्य के साथ-साथ देष की वर्तमान व्यवस्था तथा अपनाई जा रही नीतियों को जीवन के अस्तित्व के विरूद्ध बताया था। सारे विष्व में इन दिनों जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर चिन्तन चल रहा है, बाहर जाकर हमारे नेता विष्व के साथ चिन्ता जताते है पर लौटकर यहा सारी गम्भीरता को भुलाकर विकास के घिसे पिटे दषकों पूर्व के स्वरूप को प्रतिष्ठित करने तथा देष के नवधनिकों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के केवल लाभ कमाने तथा उसके लिये पूरे राष्ट्र की अस्मिता, प्रतिष्ठा तथा जिन्दगी दाँव में लगा देने पर भी आक्षेप नही करते , बल्कि उन्हे यहाँ आने के आमंत्रण स्वरूप पलक पाॅंवड़ें विछाते है। इस देष में 1947 की स्वतंत्रता स्वछन्दता लेकर आई और भ्रष्टाचार का बांध तो ऐसे टूटा कि उसमें बड़े -छोटे, राजा- प्रजा, साधु - सेठ , मालिक-नौकर सभी बह गये ।

बिगत कई वर्षों से जारी बुन्देलखण्ड का सूखा अकेले नही आया । पूरे उत्तर भारत में उसकी गूंज सुनाई पड़ी है। गंगा- यमुना पोषित अंचलों में भी क्योंकि इलाहाबाद के संगम मे जो नीलाभ पानी दिखता है उसका बड़ा हिस्सा बुन्देलखण्ड की निर्मल स्वच्छ नदियों का ही योगदान रहा है । कई वर्षो से पनप रही यहा की त्रासदी से इस देष ने तो क्या कहें हमारे दोनो राज्यों: उत्तर प्रदेष तथा मध्य प्रदेष की सरकारों. यहा के प्रतिष्ठितों, जनसेवकों तथा बौद्धिको ने भी कोई सबक नही सीखा है। यह किसी को नही महसूस हुआ कि आधी अधूरी एवं भ्रष्टाचार मूलक राहत बांटने से समस्या का समाधान नही होने वाला है और न ही विषेष पैकेज आदि बनाकर राजनैतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से । यह मानव-लोभ जनित पर्यावरण अंसतुलन की लम्बी प्रक्रिया की परिणिति है जिसका मूल 19वीं सदी के जंगलों के सरकारी अधिग्रहण से जुड़ा है। उसी के पष्चात् इस देष में जंगल, पहाड़ तथा उनसे सुरक्षित खनिज का ऐसा अन्तहीन शोषण प्रारम्भ हुआ जिसका परिणाम आज नदियों की दुर्गति तथा वर्षा और मौसम के असंतुलित होने की अपरिवर्तन स्थिति तक अनुभव किया जा रहा है। भूमि, कृषि , उद्योग , स्वास्थ तथा षिक्षा सभी क्षेत्रों में ग्राम-निरपेक्ष-सामान्य जन विरोधी एवं प्रकृति-प्रतिकूल नीतियों ने गांवो को वीरान तथा नगरों को कूड़ादान बना दिया है।

इन परिस्थितियों से निपटने के लिये आज की अनिवार्य आवष्यकता है कि:

  • जंगल तथा पहाड़ों पर आधारित उद्योग अविलम्ब बंद कर दिये जायें। स्टोन क्र्रषर्स की भूमिका पर्यावरण के विनाष में सबसे अधिक है , इन पर तत्काल रोक लगाई जाये । जंगल , पहाड़ तथा नदियां आपस में अभिन्न रूप से अन्योन्याश्रित हैं अतः इनसे छेड़छाड़ बंद की जाये। जंगल एवं पर्वत प्राकृतिक संसाधन हैं किन्तु इन पर राज्य एवं केन्द्र की सरकारों का आधिपत्य है। संरक्षण का केवल नाम है, रोजगारी का बहाना है और लगातार इन संसाधनों का सफाया होता जा रहा है। बहुमूल्य वनस्पति तथा जंगली जीव जन्तु धीरे धीरे समाप्त हो रहे है। इन सबका कारण शासन एवं प्रषासन की नीतियां ही हैं जो यदि परिवर्तित नही हुई तो इस क्षेत्र को विनाष से नही बचाया जा सकेगा ।

  • बुन्देलखण्ड का दक्षिणी भूभाग पथरीला है, इसमें मिट्टी की ऊपरी पर्त के नीचे ग्रेनाइट की चट्टाने पाई जाती है जिससे पानी अधिक मात्रा में नही रूकता और अत्याधिक तेज गति से बह जाता है। नदी के तली में भी चट्टान होने की वजह से पानी जमीन के अन्दर भी केवल दरारों एवं जोंड़ो के माध्यम से जा पाता है और वह भी बहुत कम । भूगत जल का सहारा यहाॅ मृगमरीचिका ही सिद्ध होगी । ऐसे में यदि यहां के पर्वत हरे भरे पेड़ो से सजे धजे रहे तभी वे बादलों को आकर्षित करके नियमित वर्षा करा सकते है। जंगल तथा गांवो में पेडों की अधिकाधिक संख्या ही वर्षा के पानी को कम या ज्यादा करती है तथा उसके सही समय बरसने में मदद करती है। वन संरक्षण एवं सम्वर्धन ही वर्षा को संतुलित करने का एक मात्र उपाय है। प्रवहमान नदिया ही जल विद्युत की विष्वस्त श्रोत हैं।

  • पर्यावरण, अभयारण्य, कृषि योग्य जमीनों को नष्ट करने , लाखों लोगो को प्रभावित करने वाली तथा सम्पूर्ण ग्रामीण जनजीवन को अस्तव्यस्त कर देने वाली केन-बेतवा लिंक जैसी योजनायें तत्काल निरस्त कर देनी चाहिये

  • जैविक कृषि को बढ़ावा दिया जाये ताकि कम लागत में पैदावार ली जा सके , साथ साथ भूमि की उत्पादकता भी बढ़ती रहे । देषी पषुओं का पालन तथा उनका प्रकृति के अनुकूल सुधार एवं विकास जरूरी है। गाय का गोबर तथा गोमूत्र कृषि के लिये संजीवनी है, इनका व्यापक प्रयोग किया जाये । गोवंष की उपयोगिता उनके दूध से अधिक गोवर तथा गोमूत्र के कारण है , इसे समझना जरूरी है। बैलों के द्वारा खेती की जाये , बैल चालित यंत्रों का द्रुतगति से विकास हो तथा टेैक्टर का कम से कम प्रयोग किया जाये क्योंकि इन यंत्रों से मिट्टी की संरचना , जलधारण क्षमता तथा जीवंतता समाप्त हो जाती है।

  • बुन्देलखण्ड की जलवायु तथा परिस्थितिकी के अनुरूप कृषि में शोध के लिये आवष्यक है कि यहाॅ स्थानीय कृषि के विकास हेतु उच्च स्तरीय शोध संस्थान स्थापित किये जाये जो किसानों के साथ मिल कर यहां की कृषि को सजीव , शाष्वत पर्यानुकूल एवं सार्थक दिषा दे सके । यह पूरे देष के हित में होगा।

  • यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि यहाँ उद्योगपति तथा अल्पदृष्टिपरक शासन-प्रषासन ने प्रकृति के मूल आधार को नष्ट कर देने वाले जंगल विध्वंसक तथा पर्वतों के विनाष को बढ़ावा देने वाले उद्योगों को ही बढ़ावा दिया हैः यह विषम परिस्थिति है और इससे यहा का जन जीवन पूरी तरह बरबाद हो जायेगा अतः इस प्रकार के उद्योग अविलम्ब बंद हो जाने चाहिये । जलवायु तथा मिट्टी की विविधता यहां अनेक तरह के खाद्यान्न , तिलहनों , फल , सब्जी एवं औषधीय पौधौं तथा वृक्षों के लिये उपयुक्त है । जिनके आधार पर यहां उद्योगों को विकसित किया जा सकता है ।

  • शासन तथा प्रषासन को षिक्षा संबंधी नीतियां बनाते समय स्थानीय संस्कृति, जीवन की समग्रता, व्यापकता एवं उसकी प्रभावषीलता का ध्यान रखना ही होगा ।

By: Dr. Bharatendu Prakash



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