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Tulsidas
was born on the seventh day of the bright half of the lunar Hindu month
Shraavana (July–August).Although as many as seven places are mentioned as his
birth-place, most scholars identify the place with Rajapur (Chitrakuta), a
village on the banks of the Yamuna river in modern-day Uttar Pradesh. His
parents were Hulsi and Atmaram Dubey. Most sources identify him as a Saryupareen
Brahmin of the Parashar Gotra (lineage), although some sources claim he was a
Kanyakubja or Sanadhya Brahmin.
ख्वाब सारे हम गरीबों के चुराकर रख लिए, खूब वाकिफ है जमाना
इसमें शामिल कौन है। पिछले पांच-छः वर्षों में बुन्देलखण्ड में सूखे के कारण
हताशा, कर्ज गरीबी के चलते सैकड़ों किसानों से आत्महत्या कर ली। हालात से जूझने
में नाकाम तमाम लोग अपने घर छोड़ पलायन कर गये। पानी की कमी के कारण अनके इलाकों
में बूढ़े बाप के सामने जवान होती बिटिया के ब्याह की दुश्वारियां आती हैं। खेती
की जमीन खरीदने को आसानी से कोई तैयार नहीं होता। विरोधी पक्ष के लोगों ने
विधानसभा में कई मर्तबा यह मुद्दा बड़े ही बनावटी और मार्मिक ढंग से उठाया।
लेकिन किसी भी दल की सत्ता में आसीन सरकार के सामने दाल नहीं गली। किसानों की
दर्दुशा पर वह संजीदगी दिखाई नहीं देती जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल
गांधी, मुख्यमंत्री मायावती, उमा भारती व मुलायम सिंह यादव सरीखे नेताओं के
The
dust rose from the mud road, almost blinding our path as we took a detour
from the highway. It was a mausoleum amidst the dry fields that had drawn my
attention. Earlier in the day, as I was leaving Khajuraho, Mamaji, the
erudite scholar and my guide had handed over a small piece of paper in my
hands. “You must see these places on the way to Orchha. Tell the driver, he
will understand,” he said as I scanned the paper, scrawled with a mix of
English and Hindi words with some directions.
Mamaji was unlike any other guide I had met. We had spoken on for hours about almost every aspect of the temples in Khajuraho, be it history, legends or tantrism. In impeccable English, he stuck to facts but his interpretations and pet theories would often be backed by historic claims as well. And as he walked with us, his 40 years of experience in tourism was evident, but not his 67 years of age. So when Mamaji handed over the paper to me, I decided that I must stop over at the places he mentioned.
उत्तर
प्रदेश के चार टुकड़े हुए तो बुन्देलखण्ड और शेष बचे उत्तर प्रदेश में जिले तो कम
होंगे लेकिन चुनौतियां भरपूर हांेगी। इन राज्यों में न तो वन होंगे, न ही पर्याप्त
संख्या में उद्योग। मध्य प्रदेश के छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, सागर, टीकमगढ़ एवं
उत्तर प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी, जालौन, ललितपुर व महोबा को
बुन्देलखण्ड राज्य के नक्शे में देखा जाता है। केन्द्रीय मंत्री मण्डल मे इस
क्षेत्र विशेष को मिले प्रतिनिधित्व व विधान सभा चुनाव 2012 के बिगुल के साथ एक बार
फिर यह मुद्दा गर्म होता जा रहा है।
बुन्देलखण्ड- 13 जिले (बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, उत्तर प्रदेश क्षेत्र से एवं छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, सागर, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश से)।
मुश्किल ही मुश्किल- इस पथरीले इलाके में हमेशा पानी का संकट, सूखा, भुखमरी व किसान आत्महत्याओं की युगलबन्दी, कोई स्थायी उद्योग नहीं, कृषि नाम मात्र की, ज्यादातर ऊसर-परती व ऊबड़, खाबड़ जमीन, पलायन आय का अतिरिक्त कोई संसाधन नहीं है।
वन क्षेत्र- उत्तर प्रदेश के सात जिलों में अनिवार्य 33 प्रतिशत वन क्षेत्र के मुकाबले बांदा में 1.21 प्रतिशत वन क्षेत्र व अन्य की स्थिति, 21.6 प्रतिशत चित्रकूट अधिकतम से ज्यादा नहीं है। मध्य प्रदेश के 6 जिलों में छतरपुर, पन्ना इलाके में ही आंशिक वन क्षेत्र है वह भी ईंधन उपयोगी ही है।
खनिज सम्पदा- बुन्देलखण्ड के चित्रकूट मण्डल के चार जिलों में जिस गति से खनिज संसाधनों का दोहन हो रहा है। चाहे वन हो या पहाड़ उसे बचा पाने की रणनीतियां नहीं हैं। यही स्थिति मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ व छतरपुर की है। जहां सरकार ने आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी को बेतहासा खनन के लिये पहाड़ों व नदियों के पट्टे कर दिये हैं।
विगत कुछ वर्षों से बुन्देलखण्ड मे जलवायु परिवर्तन के लक्षण स्पष्ट दिखने लगे हैं। अंग्रेजी षासन में उन्नीसवीं षताब्दि के उत्तरार्ध मे जो वन-अधिग्रहण और साथ साथ तथाकथित वैज्ञानिक प्रबंधन जिसका हस्र वन विनाष के साथ प्रारम्भ हुआ था, 1947 के बाद स्वषासन मे उसका विकराल रूप बड़े पैमाने पर वन की कटाई , उद्योग के नाम पर पहाड़ों पर उत्खनन तथा नदियों पर बांध बनाने की होड़ के रूप मे प्रकट हुआ। यहा की प्राकृतिक सम्पदा ही यहां की बरबादी का कारण बन गई । वनों की अभूतपूर्व कटाई के बाद हीरा के उत्खनन मे विदेषी कम्पनियां , ग्रेनाइट के उत्खनन तथा क्रषिंग, बालू के निष्कासन तथा बड़े प्रोजेक्ट्स को लागू कराने वाले उत्तर भारत के बड़े पूंजीपति ठेकेदार और इस सबसे लाभांष पाने वाले बहुसंख्यक राजनेता , टेक्नोक्रेट्स तथा नौकरषाह आदि सबकी मिली भगत यहं के पर्यावरण के लिये अनियंत्रित रूप से घातक सिद्ध हुई है। परिणाम अब सामने आ रहे हैं। मौसम मे अनिष्चितता आ गई है, वर्षा अनियमित हो गई है, गर्मी तथा सर्दी के तापमान मे लगातार परिवर्तन दिखने लगा है, और अच्छी उर्वर मिट्टी के बावजूद खेती अनार्थिक हो गई है।
गांवों मे जो खेती का काम था वह भी मौसम की मार ,किसान की क्षमतायें घटने तथा
तथाकथित राजनैतिक से अधिक जाति आधारित चेतना के कारण मजदूरों को आकर्षित नही करता ।
अधिकांष कृषि मजदूर काम और जीविका उपार्जन तथा नगरों के विस्तार मे सहायक की भूमिका
मे काम की तलाष मे बाहर जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों मे घर के पुरुषों के अतिरिक्त
सारा परिवार ही पलायन करने लगा है परिणाम यह है कि गांवों मे अधिकांष घरों मे वर्ष
भर ताले लगे दिखते हैं, सक्षम किसान ट्रैक्टर खरीद रहे हैं, हरयाणा तथा पंजाब के
कम्बाइन हारवेस्टरों की यायावरी बढ़ी है तथा रबी फसल के बाद खेतों मे फसल अवषेष की
जलती होली आज आम दृष्य है। फलतः भूमि की उर्वराषक्ति तथा उसे बनाये रखने वाले
जीवांष सभी नष्ट हो रहे है। जहां पहले रसायन का प्रयोग षून्य था वहा उसकी पैठ बढ़ी
है तथा उर्वरक वितरण के समय का दृष्य हृदय विदारक हो गया है। एक मात्र स्वतंत्रजीवी
अन्नदाता किसान भिखारी बना दिया गया है । बैंक तथा साहूकारों की अमानवीय व्यवस्था
ने उसे आत्महत्या की कगार मे लाकर खड़ा कर दिया है। कृषि प्रधान भारत का किसान आरत
हो रहा है और दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजार की प्रतिष्ठा प्राप्त कर यह देष दुनिया
भर से प्रतिवर्ष लिये जाने वाले ऋण के बल पर हवा भरे गुब्बारे की तरह अपनी प्रगति
के आंकड़े और प्रतिव्यक्ति प्रतिषत आय की बढ़ोत्तरी के दावे कर रहा है। कृषि का
क्षेत्र हो अथवा षिक्षा, स्वास्थ्य या उद्योग का हर क्षेत्र मे विदेषी कम्पनियो,
भारत की कतिपय बहुआयामी कम्पनियों, तथा यहा का षिक्षित सुविधाप्राप्त वर्ग अपने
हित मे ही सारे निर्णय के लिये सरकार पर हावी हो जाते हैं। उस समय आम जनता का न तो
कोई प्रतिनिधि नज़र आता है और न ही उसकी आवाज पर कोई ध्यान देता है।
बुन्देलखण्ड हो अथवा सम्पूर्ण भारत का समाज, उसकी स्थिति का विष्लेषण निम्न दृष्य प्रस्तुत करता है:
क्षेत्र तथा समाज के मूलभूत शक्ति-बिन्दु:
क्रशर के गुबार में खतम होती जिंदगी ,
प्रकृति को मिटाएगी अमानवीय दरिंदगी ,
क्रशर के गुबार में खतम होती जिंदगी !
दबंग और माफिया पहाड़ को उजाड़ते ,
पेड़ - हरयाली सब मिलकर उखाड़ते ,
विनाश की शर्त पर विकास की ये बानगी.....
क्रशर के गुबार में ख़तम होती जिंदगी !
डस्ट व प्रदूषण ने खेत तक बंजर किये ,
खेतिहर किसान खेती बिन कैसे जिए ?
क्रशर की मंडी में पत्थर को तोड़ता बालश्रम ,
1. सरकारी योजनाओं में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार और बी0पी0एल0
कार्ड धारकों के चयन पर उठाये गये सवाल,
2. ग्रीन पीस व आशा नेटवर्क और भारतीय किसान यूनियन ने किया
ब्राई बिल (बायोटेक्नालाजी रेग्युलेटरी अथारिटी आफ इण्डिया), जी0एम0 फसलों का
पूरजोर विरोध,
3. बुन्देलखण्ड़ में हो रही किसान आत्महत्याओं पर रोक के लिये
प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन पर दिया जोर,
झांसी- हृयूमन राइट्स ला नेटवर्क एवं बुन्देलखण्ड आपदा निवारण मंच, अन्य कई समाज सेवी संगठनो के संयुक्त प्रयास भोजन के अधिकार व काम के अधिकार अभियान पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन झांसी की वीर भूमि में 27,28 अगस्त 2011 को आयोजित किया गया। इस कार्यशाला में कई राज्यों के स्वतंन्त्र कार्यकर्ताओं, समाजिक संगठनो के साथ-साथ मानवाधिकार कार्यकर्ताआं ने सहभागिता की।
कार्यशाला के प्रथम दिवस भोजन के अधिकार व काम के अधिकार पर
सम्बांधन करते हुये मंच का संचालन कर रहे उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के अधिवक्ता
के0के0राय ने बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में सिलसिलेंवार हो रही किसान आत्महत्याओं पर
चिंता व्यक्त की। उन्होंने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 1 लाख से कम रकम
वाले किसानों से कर्ज वसूली के लिये बैंको को रोके जाने के निर्देश की भी बात रखी।
के0के0राय ने बताया कि तीन विधि छात्रों ने बुन्देलखण्ड के 62 गांव का भ्रमण कर
किसान आत्महत्याओं के जो तथ्य जुटाएं है वह बुन्देलखण्ड की भयावह स्थिति की तरफ
संकेत करते है। भोजन के अधिकार की उत्तर प्रदेश कनवेनर बिन्दु जी ने समाजिक संगठनो
से साझा अभियान की बात उठाई। उरई की समाज सेवी संस्था परमार्थ के संजय सिंह ने बड़े
ही बेबाक शब्दों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते हुये कदमों की आहट बुन्देलखण्ड
की तरफ आने की बात कहीं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में खामियां
और बुन्देली किसानों को जिस तरह से बैंको की मकड़ जाल में उलझाया जा रहा हैं उनसे
किसानो की मनोदशा आत्महत्या की तरफ प्रेरित होती है। भारतीय किसान यूनियन के
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष यदुबीर सिंह ने प्रदेश की सरकारो को आड़े हाथों लेते हुये भूमि
अधिग्रहण कानून की आड़ में किसानो को उनकी ही जमीनों से बेदखल करने के आरोप लगाते
हुये केन्द्र सरकार को चारों तरफ से घेरा। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि
कारपोरेट सेक्टर, बिल्ड़रो को जिस तरह से सेज और बहुमंजिला बिल्ड़िंग के नाम पर किसान
की जमीने सरकार अधिग्रहण करके सौंप रही है उससे प्रदेश की सरकार किसानों की कितनी
हिमायती है इस बात का अंदाजा लगता है।
अन्ना की आंधी: एक रोमांच मुकाबले का सीधा हाल
अभी हाल ही मैं हम ने भारतीय क्रकिट टीम को इगलैण्ड की धरती पर घुटने टेकते देखा
है।
हमारी भारतीय क्रकिट टीम ने तीन माह पहले ही विश्व कप जीतकर 24 साल पहले लिखे गए
इतिहास को दोहराया था इस सीरीज के पहल यह टीम टेस्ट क्रकिट के सर्वोच्य स्थान स्थान
प्राप्त कर चुकी थी।मगर इगलैण्ड में चार टेस्ट मैचौ की सीरिज हार ने के बाद इसे अपनी
इसे अपने टेस्ट मैचो के सर्र्वोच्य स्थान के साथ से हाथ धोना पडा सभी टेस्ट मैच
हारने के बाद भारतीय क्रकिट टीम को भारतीय मीडियां के साथ विदेशी मीडियां ने भी आड़े
हाथो लिया।
यह हार भारतीय क्रकिट के इतिहास में सबसे शर्मनाक हार रही है। इसी सबके बीच भारत में एक और मैच सरकार और जनता के बीच चल रहा है। यह मैच में हठ और हम की के बीच चल रहा है जिसके परिणाम ऐतीहासिक और निर्णायक होगा जिसके ऊपर सारे देश का भविष्य निर्भर करेगा। इस मैच जनता और जनता के द्वारा चुने हुए गए जनप्रतिनिधी आमने सामने आ गए है। जिसमे एक टीम की कप्तानी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिह कर रहें है और दूसरी टीम की कप्तानी जाने-माने समाज सेवी अन्ना हजारे कर रहे है। दोनो हि टीमे अपने-अनपे मुदद् लेकर भारत के मैदान में उतर चुकी है।
Ruled by the Chandelas until the sixteenth century, the area of Bundelkhand area comprises the districts of Uttar Pradesh and Madhya Pradesh -- Damoh, Sagar, Chhattarpur, Panna, Tikamgarh, part of Satna, and right up to Gwalior, from Madhya Pradesh; Jalaun, Jhansi, Hamirpur, Mahoba, Lalitpur and Banda districts of Uttar Pradesh. Damoh is well-known for the legend of Rani Durgawati who fought bravely against the Mughals. Today, the district is also known for its sanctuaries like Nauradehi Sanctuary in Tendukheda block and Rani Durgawati Sanctuary in Jabera block.
Based in the town of Tejgarh in Damoh, the Bundelkhand Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (BMKSS) was formed in July 2007, with an aim towards ensuring the ownership of forest land by tribals, dalits and people from other backward castes, as per the Forest Rights Act of 2006. The sangathan was earlier supported by the Grameen Vikas Samiti, but owing to differences in principles, it became a separate entity in 2007. Education and the public distribution system (PDS) are also among the core areas of the sangathan's work. Currently, it has taken a strong stance against alignment with any political party, as it sees itself as a strong opposition to the administration, no matter which party is in power.
Bundelkhand region is known for its abundance of natural
resources but today this is one of the poorest regions of the country. The
total amount of current outstanding rural bank debts in Bundelkhand is Rs
4,370.32 crore. This is 21% more than 2010 when the total bank debts stood
at Rs 3,613.22 crore. As many as 519 suicides have been reported from the
seven districts of the parched and extremely backward region in the five
months of this year. In the year 2009, 568 farmers and in 2010, 583 farmers
have committed suicide due to various reasons in Bundelkhand as per official
records. Taking suo moto action on the reports of farmer's suicide and
distress in Bundelkhand region, Allahabad High Court tasked Uttar Pradesh
and Central Government to submit report. Since 2002, three years have been
declared drought-affected: in 2002, 2004 and 2009. Bundelkhand region covers
seven districts of Uttar Pradesh (Banda, Chitrakoot, Hamirpur, Jalaun,
Jhansi, Lalipur and Mahoba) and six districts of Madhya Pradesh (Chhatarpur,
Damoh, Datia, Panna, Sagar and Tikamgarh). Rivers like Ken, Betwa, Yamuna,
Mandakini and many other seasonal rivers flow through Bundelkhand but the
area is yet rain fed.
The indebtedness: The indebtedness among farmers can be understood by the official records that total amount of current outstanding bank debts in Bundelkhand is Rs 4,370.32 crore. This is 21% more than 2010 when the total bank debts stood at Rs 3,613.22 crore. In four of the worst affected districts- Banda, Hamirpur, Lalitpur and Jhansi, farmers owe banks about Rs. 2750 crores. Siddiqui (2011) revealed the fact that total loan outstanding of Rs. 1791 crore is only on the farmers of Chitrakoot Dham Karwi commissionaire.